जब तमाम तरह की सर्जरी देश में चल रही हों, तो लोगों को अपने फैसलों से हैरान करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 500 और 1000 रुपये के नोटों को बंद करने का फैसला आने वाले चुनावों पर सर्जिकल स्ट्राइक माना जा रहा है। मास्टर कम्युनिकेटर नरेंद्र मोदी ने इस बार संवाद के लिए नोट का सहारा लिया है और संदेश है काले धन और आतंकवाद से लड़ाई का। फैसला सही है या गलत, जनता ही तय करेगी, लेकिन नोटों को लेकर हुए इस फैसले का असर देश के हर नागरिक पर पड़ेगा।
सी के साथ उन्होंने अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों की नींव रख दी है. जब भी 500 का नया या 2000 का बिल्कुल नोट हाथ में आएगा तो सरकार के फैसले की याद आएगी या याद दिलाई जाएगी. कुछ वैसे ही, जैसे गांधीनगर में सीएम हाउस के बाहर उस व्यक्ति ने सिक्का दिखाकर किया था.
क्या वास्तव में जाली नोटों पर लगेगी लगाम
वर्ष 2015-16 में 500 रुपए के 2.61 लाख नोट तथा 1000 रुपए के 1.43 लाख नोट पकड़े गए जिनकी कुल कीमत लगभग 28 करोड़ रुपए की होती है. 15 लाख करोड़ के नोटों को रिजर्व बैंक द्वारा छापने में ही लगभग 12 हजार करोड़ का खर्च आएगा तथा अल्प समय के लिए पूरी बैंकिंग प्रणाली ठप हो जाएगी. अगर जाली नोटों की संख्या ज्यादा है भी तो उसका वैज्ञानिक निदान करने की बजाय देशव्यापी हडक़ंप मचाना, कितना कानूनी और व्यवहार-सम्मत है?
देश ने 30 सितंबर को भारत द्वारा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक की जब बात सुनी तो उसके मन में गुबार उठा कि ये सिलसिला अब बंद न हो। इसी दिन सरकार द्वारा देश के कालाधन धारकों को टैक्स भर कर अघोषित संपत्ति को सार्वजनिक करने की योजना की समय सीमा भी समाप्त हो गई जिसमें लगभग 65 हजार करोड़ का काला धन सामने आया। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक रैली में कालाधन पर सर्जिकल स्ट्राइक करने की बात कही जिसे लोगों ने हल्के में लिया कि ऐसी जुमले तो अब आम हो चुके हैं। परंतु, 8 नवंबर को राज 8 बजे राष्ट्र के नाम संबोधन में मोदी ने जब 500 और 1,000 रुपये के नोटों को मध्य रात्रि से ही बंद करने की घोषणा की तो दुनिया के साथ-साथ राजनीतिक पार्टियों को पहली बार अंदाजा हुआ कि सर्जिकल स्ट्राइक होती क्या है? कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और अन्य नेताओं की ओर से कालाधन समाप्त करने के नाम पर लिये गए इस फैसले की मुखालफत करने के लिए हर तरह के तर्क दिए गए, जिन्हें कसौटी पर ना तोला जा सकता है और न ही सही-गलत की व्याख्या की जा सकती है, परंतु इतना अवश्य कह सकते हैं कि चोट कहीं लगी है और दर्द कहीं हो रहा है। बड़े नोटों की रोक पर अब मायावती के भडक़कर इसे अघोषित आर्थिक इमरजेंसी लगाए जाने के आरोप को भी इसी श्रेणी में ही रखा जाएगा क्योंकि कुछ भी हो, कालाधन के दम पर ही पांच राज्यों में लड़े जाने वाले चुनावों की रीढ़ इस एक सर्जिकल स्ट्राइक ने तोड़ दी है। मायावती का दर्द यहीं नहीं थमता, वे जलन भरे आंसू भी बहाती हैं कि बीजेपी ने अपना बंदोबस्त कर लिया है। उन्होंने अपना कालाधन व?विदेश भेज दिया है और 100 साल के लिए अपनी स्तिथि मजबूत कर ली है। उम्मीद है कि वह इससे आगे सोचेंगीं और स्वस्थ मुद्दों पर टैक्स के पैसे के साथ चुनाव लडऩे के स्वस्थ विकल्प पर ध्यान देंगीं और सोचेंगी कि इस फैसले से परेशानी आम आदमी को नहीं, उस व्यक्ति को है जिसे अपने पास मौजूद पैसे के ओरछोर का ही पता नहीं है। और देश को विकास काना है तो कालाधन की समानांतर चल रही अर्थव्यवस्था को खत्म करना बेहद जरूरी है भले ही यह निर्णय चार दिन पहले लिया गया होता, या चार दिन बाद। बहस अगर होनी तो इस बात पर हो कि आखिर 1,000 का नोट बंद करके 2,000 रुपये का नोट क्यों लाया जा रहा है, क्य इससे भविष्य में भ्रष्टाचार और बढऩे के रास्ते नहीं खुलेंगे? बहस इस बात पर भी हो कि केवल घरेलू काले धन पर ही स्ट्राइक क्यों, विदेश जाने वाला धन कब और कैसे वापस आएगा, इस बारे में कब घोषणा की जाएगी? इस बात पर भी बहस हो कि कहीं इस फैसले के संदर्भ में सरकार का निशाना सिर्फ आम आदमी ही तो नहीं क्योंकि अमीर लोग, जो अब तक 20 प्रतिशत सीए को देकर अपने सैटलमेंट कर लेते थे, वे अब 30 प्रतिशत भर देंगे। क्योंकि अगर केवल आम आदमी पर प्रहार के लिए ही अर्थव्यवस्था को संकट में डाला गया है, बड़ी तादाद में नोट छापकर देश पर एक नय बोझ डाला गया है, तो उसे माफ नहीं किया जा सकता।
क्या बदलेगी सूरत?
केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए देश के अंदर जमा काले धन को एक ही झटके में तबाह कर दिया है जिसका सीधा असर कुछ महीनों में होने वाले उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनाव में देखा जा सकेगा। फैसले से उन नेताओं की धडक़नें जरूर बढ़ गई हैं, जो काले धन के जरिए चुनाव जीतने का सपना देख रहे थे। वैसे तो विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार के खर्च की सीमा 28 लाख रुपए निर्धारित है। लेकिन, हकीकत सभी जानते हैं कि कैसे राजनीतिक पार्टियां पैसों से चुनावी टिकट बांटती हैं, जिनका पूरा लेन-देन कालाधन के जरिए होता है और यही इक_ा की गई कालाधन चुनाव के दौरान लोगों में बांटी जाती है। वहीं, उम्मीदवार पार्टी फंड से अलग दस करोड से लेकर 50 करोड़ तक की कालाधन को लोगों में बांटते हैं, जिसका कोई रिकार्ड नहीं होता है। विदेशों में जमा काले धन को चुनाव के वक्त हवाला के जरिए देश में लाया जाता है, जिसका चुनावों में खूब इस्तेमाल होता है। असल में मुद्रा हर व्यक्ति तक अपनी बात पहुंचाने का सबसे आसान तरीका है. मुद्रा के जरिये भी बात पहुंचती है और मुद्रा के बारे में बात करके भी। चुनाव की रैलियों में मुद्रा बांटकर भी लोग लाए जाते हैं और मतदान केंद्रों तक भी। लेकिन, चुनाव से कुछ महीने पहले सरकार के इस कदम से बड़ी मात्रा में कालाधन को रोका जा सकेगा, साथ ही पैसों के बड़े लेन-देन पर नजर रखकर कालाधन पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
क्या नोटों की शक्ल में रहता है काला धन
बड़ा सवाल है कि काला धन यानी नंबर दो का पैसा नोटों की शक्ल में कितने लोग रखते होंगे. कालाधन रखने का मुनाफेदार जरिया सोना और बेनामी जमीन जायदाद होती है. अर्थशास्त्र का नियम है कि धन का वेग घटा दिया जाए तो उसका मूल्य भी घटता है. धन का वेग धटने का मतलब कि अगर पैसे को बाजार में घुमाया न जाए तो उसका मूल्य तो वैसे ही कम होता चला जाता है. यानी काला धन धड़ल्ले से उद्योग व्यापार में खपा रहता है. वैसे उसे सफेद करने की ऐलानिया योजनाओं का तो ढेर लगा हुआ है. थोड़ा सा जुर्माना देकर कोई कितना भी काला धन सफेद कर ले गया. धर्मादा ट्रस्ट और सामाजिक संस्थाओं से जोड़तोड़ करके काले से सफेद और टैक्स बचाने के लिए सफेद से काला करने के तरीके खत्म नहीं हो रहे हैं बल्कि रोज ब रोज बढ़ ही रहे हैं.
भ्रष्टाचार पर कितना असर
इसका कोई हिसाब नहीं लग पा रहा है. वैसे कहा यह जा सकता है कि घूस लेने के लिए बड़े नोटों के लेन देन में जो सुविधा होती थी वह और बढ़ सकती है. फिलहाल अनुमान लगाया जा सकता है कि दो हजार का नोट चल पडऩे के कारण अटैची में दुगनी रकम लेकर चलने में आसानी हो जाएगी. यानी पुराने बड़े नोट बंद करने से भ्रष्टाचार कैसे रुकेगा इसकी तार्किक व्याख्या करने में मुश्किल आ रही है.
राजदलों पर क्यों नहीं कार्रवाई
राज्य तथा केंद्र के चुनावों में राजनीतिक दलों तथा नेताओं द्वारा 5 लाख करोड़ से अधिक खर्च किया जाता है जिनमें अधिकांश ब्लैकमनी होता है. यूपी के प्रस्तावित चुनावों में बीएसपी द्वारा प्रत्याशियों से 1200 करोड़ से अधिक की वसूली हुई है. कांग्रेस और भाजपा समेत सभी दलों द्वारा चुनाव आयोग के सम्मुख आय-व्यय के गलत ऐफिडेविट दिए जाते हैं, जिन दलों पर सरकार द्वारा कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? देश में भ्रष्टाचार से अर्जित अधिकांश पैसा विदेशों में जमा है. सीबीआई डायरेक्टर एपी सिंह द्वारा फरवरी 2012 में यह बताया गया था कि 500 बिलियन डॉलर (लगभग 30 लाख करोड़ रुपए) विदेशों में जमा है. भाजपा द्वारा इस पैसे को भारत लाकर हर व्यक्ति के अकाउंट में 15 लाख रुपए जमा करने का वादा किया गया था, जिसे पूरा करने की बजाय आम जनता के पैसे को ही कागज की रद्दी क्यों बना दिया गया?
अर्थव्यवस्था सुधारने जादू नहीं और कड़े कदम जरूरी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 500, 1,000 रुपयों को रातोंरात बंद किए जाने के निर्णय से थोड़ी अव्यवस्था तो क्रिएट होगी, लेकिन यदि हमें अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाना है तो उसके लिए किसी जादू की नहीं, बल्कि बेहद कड़े कदम उठाने ही होंगे। हां, जिस तरह से सरकार ने पैसे की आवाजाही पर निगाह रखने की तैयारी की है, वैसी ही यदि ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को लूटपाट से बचाने की लिए भी की जानी चाहिए। मेरा मानना है कि इस कदम से विदेशी निवेश बढ़ेगा, राजकोषीय घाटे पर लगाम लगेगी और कालाधन 25 प्रतिशत तो कम होगा ही।
सीए एवं अध्यक्ष नागपुर चेंबर ऑफ कामर्स लिमिटेड
और भी हैं सवाल…
कानून के अनुसार आरबीआई द्वारा जारी नोटों पर जनता को भुगतान देने के लिए सरकार सार्वभौमिक गारंटी देती है. प्रधानमंत्री मोदी ने 500 और 1000 के नोटों को रद्दी कागज का टुकड़ा बताया है. क्या भारत सरकार जनता को दी गई गारंटी को पूरा करने में विफल रही है?
देश में कुल 17 लाख करोड़ की करेंसी में 8.2 लाख करोड़ (500 के नोट) और 6.7 लाख करोड़ (1000 के नोट) पूरी करेंसी का 86 फीसदी हैं, जो अब प्रचलन से बाहर हो गए हैं. सरकार के इस निर्णय से अर्थव्यवस्था ठप सी हो गई है। क्या इस निर्णय के पहले सरकार को संविधान के अनुच्छेद-360 के तहत देश में आर्थिक आपातकाल की घोषणा नहीं करनी चाहिए थी?
देश में नगदी नोटों से आम जनता की अर्थव्यवस्था चलती है, जबकि बड़े लोग बैंकिंग प्रणाली से कारोबार करते हैं. देश में 2.7 लाख करोड़ के रोजाना बैंकिंग ट्रांजेक्शन और सालाना 800 लाख करोड़ के बैंकिंग कारोबार की जांच करने में इनकम टैक्स, एफआईयू और अन्य एजेंसियां क्यों विफल रही हैं?
सवाल भी उठेंगे
तथ्यों को नजऱअंदाज़ नहीं कर सकते कि 2,000 के नोट की तस्वीर कई दिनों से सोशल मीडिया में घूम रही थी। जो लोग बड़े पैमाने पर नगद काला धन रखते हैं, वो इस तरह के इशारे को तुरंत समझ जाते हैं। जब ऐसे लोगों को ये सूचना मिल जाए तो वो क्या क्या कर सकते हैं! वैसे भी अखबारों में छह-सात महीने से पांच सौ और हजार रुपये के नोट बंद करने के विश्लेषण तो छप ही रहे थे। अक्टूबर में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्राबाबू नायडू ने केंद्र सरकार से मांग की थी कि पांच सौ और हजार के नोट बंद कर दिए जाएं। तो देखना होगा कि इसका फायदा किन लोगों ने उठाया. शायद पता भी न चले। क्या ऐसे लोग वाकई बर्बाद होंगे? कहना मुश्किल है। क्या हम उम्मीद करें कि राजनीतिक दल अपने पैसे का सोर्स पब्लिक को बताएंगे? जो राजनीतिक दल बीस हजार से कम का चंदा लेते हैं ताकि कानूनन चंदा देने वाले का नाम न बताना पड़े, कैसे यकीन कर सकते हैं, वो काला धन खत्म करेंगे। आम आदमी से चार हजार का हिसाब मांगा जा रहा है और खुद कानून बनाने वाले बीस हजार का हिसाब नहीं देते।
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