कितना महान बनेगा अमेरिका?
ट्रंप के बाजी मार लेने के बाद अब दुनिया को इंतजार है, उन खतरनाक फैसलों का जिनका वादा उन्होंने प्रचार के दौरान किया था? क्या वह ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के अपने वादे को निभाने के लिए दुनिया से आतंकवाद का सफाया करने का वादा पूरा करेंगे? क्या उनका यह वादा कि अमेरिका को आतंकवाद के खतरे से बचाने के लिए जरूरी है कि देश में मुसलमानों की एंट्री पर पाबंदी लगाई जाए, वाकई अमेरिका को ग्रेट बनाएगा? सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या उम्मीदवार ट्रंप राष्ट्रपति ट्रंप पर भारी पड़ेंगे?
राजनीति में बड़ा फेरबदल करते हुए तोडफ़ोड़ की बातों के खिंचे अमेरिकियों ने डॉन डोनाल्ड ट्रंप के हाथों दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के परमाणु अस्त्रों का रिमोट देते हुए जरा भी यह नहीं सोचा कि एक गैरराजनीतिक व्यक्ति ने यदि कभी इनका इस्तेमाल बंदर के हाथ में उस्तरा दिए जाने सरीखा कर लिया तो क्या होगा? इसलिए ट्रंप के 45वें राष्ट्रपति बनने पर दुनिया को सिरफुटौव्वल तो होनी ही होगी कि यह कैसे और क्योंकर हो गया? और इसके अब अंजाम क्या होंगे? जिस व्यक्ति को दौड़ में ही नहीं माना जा रहा था, उसके अचानक सिंहासन पर जा बैठने से तमाम राजनीतिक व मीडिया पंडित सदमे में हैं और ट्रंप की जीत को उसी तरह विचलित करने वाला बता रहे हैं, जैसे उन्होंने मिडिल ईस्ट में इस्लामिक स्टेट के प्रादुर्भाव और हिंदुस्तान में नरेंद्र मोदी की जीत को विशेषण दिए। अब तक ट्रंप विवाद, निजी जिंदगी के किस्सों और मसालेदार बयानों के लिये जाने जाते रहे हैं। कई देशों के लोगों ने उन्हें दुनिया की शांति व सुरक्षा के लिए खतरा माना क्योंकि उन्होंने मुस्लिमों, प्रवासियों व मैक्सिको के लोगों को लेकर तल्ख टिप्पणियां की थीं। वह आप्रवासियों के सख्त विरोधी के तौर पर मशहूर हैं और चीन व भारत से नौकरियां वापस लाने की बात कह चुके हैं। इस सबके साथ विचलित करने वाली बात यह भी है कि अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों को चुनौती देने वाले ट्रंप को अब अहिंसक क्रांति का नायक बताया जा रहा है। क्या वास्तविकता इतनी सी है कि वह अबकी बार मोदी सरकार के नारे पर सवार होकर चुनावी वैतरणी पार कर गए हैं या फिर दुनिया में फंडामेंटलिस्ट पार्टियों और विचारों का वर्चस्व उसी भांति स्थापित होने जा रहा है, जैसा कि द्वितीय विश्व युद्ध के समय हुआ था।
‘जोकर’ या अहिंसक
क्रांति के नायक?
क्या नरेंद्र मोदी, आईएस और ट्रंप के आकस्मिक, अप्रत्याशित आगमन को वैश्विक आक्रामकता की वापसी माना जा सकता है जिसे आज का युवा वर्ग बेहद पसंद कर रहा है। इसी क्रम में ईरान, इजराइल, फ्रांस, जर्मनी में भी परिवर्तन स्पष्ट देखे जा सकते हैं। रूस के रुख में भी पिछले वर्षों में यही बदलाव आया है। यूरो से ब्रिटेन के बाहर होने के फैसले को भी इसी श्रेणी में रख सकते हैं और अब ट्रंप की जीत को भी इन्हीं परिवर्तनों के नजरिये से देखा जाना चाहिए, इन्हीं कसौटियों पर कसा जाना चाहिए। सोचना यह भी होगा कि जिस विरोध की लहर पर सवार होकर सत्ता शीर्ष पर पहुंचने के साथ ही नरेंद्र मोदी की सोच में बदलाव आया और यह अधिक व्यापक एवं वैश्विक हुई, और उन्होंने मुसलमानों को राष्ट्रभक्त तो बताया ही कथित गौरक्षकों को उत्पीडक़ व गुंडों की श्रेणी में भी रखने से उन्होंने कोई गुरेज नहीं किया, उसी तरह क्या उम्मीदवार ट्रंप और राष्ट्रपति ट्रंप की सोच बदलेगी? उम्मीदवार ट्रंप ने अमेरिका को दुनिया से काटने की वकालत की है, अब राष्ट्रपति ट्रंप विरोधियों ही नहीं, उनको वोट नहीं देने वालों आदि सबको साथ लेकर चलने की बात पहले भाषण से ही कर रहे हैं, निश्चित रूप से यह सोच का बदलाव यदि पद संभालने की गंभीरता से उपजा है, तो उसका स्वागत किया जा सकता है और यदि दिखावा है तो यह भी कड़वा सच है कि दुनिया से कटकर आज कोई देश ना अपने अच्छे दिन हािसल कर सकता है और न ही महान कहला सकता है।
जोकर समझने की गलती
69 साल जरूर लगे, लेकिन डोनाल्ड ने साबित कर दिया कि वो पैदा ही ट्रंप हुए थे। रिपब्लिकन पार्टी से नॉमिनेशन मिलने के पहले से ही ट्रंप पर इल्जामों की बौछार होने लगी जिनमें उन्हें महिलाओं के लिए ऑक्टोपस से लेकर मीडिया में जोकर तक बताया गया। पूरा अमेरिकी मीडिया क्या अखबार, क्या टेलीवीजन और क्या रेडियो सबके सब ट्रंप के खिलाफ लामबंद हो गए। अमेरिका सबसे पुराना लोकतांत्रिक देश तो है ही, साथ में लिबरल भी। लिबरल इतना कि वो सारे एथिक्स भूल कर उम्मीदवार के पक्ष में वैसे खड़ा हो जाता है जैसे खुद पार्टी हो। अमेरिकियों के बीच ट्रंप को मुस्लिम विरोधी के तौर पर भी समझाने की कोशिश की गई। लेकिन अब ये सब इतिहास का हिस्सा हो चुका है। आज ये सभी लोग सोच सकते हैं कि कहीं उनके अति उत्साही कदमों और एकपक्षीय विचारों तो नहीं ट्रंप की जीत की राह आसान कर दी। जैसी लोगों ने सिर्फ और सिर्फ मोदी का विरोध करके और उनको शैतान जैसे विशेषणों से नवाज कर की थी। 2014 में चुनाव जीतने के बाद नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ये भारत ही है जहां एक चाय वाला भी प्रधानमंत्री बन सकता है – और अब ट्रंप भी कह सकते हैं कि ये उनके मुल्क का संविधान ही है जो एक आम अमेरिकी को भी राष्ट्रपति बनने का पूरा मौका देता है – भले ही पूरी जिंदगी उसका सक्रिय राजनीति से कोई वास्ता न रहा हो।
कस्बों के ट्रंप
न्यूयार्क, लॉस एंजिलेस, शिकागो, वॉशिंगटन और बॉस्टन जैसे अमेरिका के 35 बड़े शहर, जिन्हें किसी भी परिभाषा से देखें तो स्मार्ट सिटी ही कहे जाएंगे। किसी भी नागरिकता के लोग यहां आसानी से दिखते हैं। इन 35 में से 31 शहरों ने अपने लिए बतौर राष्ट्रपति डेमोक्रेटिक कैंडिडेट हिलेरी क्लिंटन को अपनी पसंद बनाया। लेकिन, इस शहरों से दूर हजारों कस्बों और छोटे शहरों की पहली पसंद सिर्फ और सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप रहे। अमेरिकी चुनाव में शहरवार आए इस आंकड़े से एक बात साफ है कि असली अमेरिका इन कॉस्मोपॉलिटन शहरों में नहीं बसता। चुनावी गणित के मुताबिक असली अमेरिका वही जहां का वोटर अपनी पसंद को दुनिया की सबसे ताकतवर कुर्सी पर बैठा सके। यह दुनिया का सबसे पुराना और महान लोकतंत्र है और इस तंत्र में संख्या सबसे महत्वपूर्ण है। दो साल पहले भारत ने अपने लिए जब प्रधानमंत्री का चुनाव किया तो इस तंत्र में भी संख्या का जोर दिखा और नरेन्द्र मोदी ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई। ट्रंप की जीत से साफ है कि उनके साथ संख्या उस असली अमेरिका की है जो बीते कई दशकों से क्लिंटन, बुश, ओबामा, जैसे राष्ट्रपतियों की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं का शिकार बन, वल्र्ड सिटी, स्मार्ट सिटी, मेल्टिंग पॉट, साइबर सिटी जैसे क्षेत्रों में विकास को सीमित रहता देख रहे थे।
चीन और जापान से ट्रेड वॉर
ट्रंप ने दावा किया है कि वह चीन और जापान जैसे देशों के खिलाफ ट्रेड वॉर छेड़ेंगे। ऐसा इसलिए कि इन दोनों देशों ने बिते कई दशकों में अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मात दी है। दोनों देशों ने अपनी घरेलू मुद्रा के साथ छेड़छाड़ कर डालर के मुकाबले फायदा उठाया है। इन देशों ने सस्ते दरों पर काम कर अमेरिका में बेरोजगारी बढ़ाने में मदद की है।
फ्री ट्रेड पर प्रतिबंध
चीन और जापान के अलावा अमेरिका को कई एशियाई देशों से भी व्यापार में नुकसान उठाना पड़ रहा है। ट्रंप का मानना है कि इसके लिए अमेरिका को फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से बाहर निकलने की जरूरत है। ट्रंप का दावा है कि ज्यादातर देश अमेरिकी कंपनियों के लिए कड़े मापदंड रखते हैं जिससे बीते कई सालों में अमेरिका का कारोबार सिकुड़ रहा है और इन देशों में तेज ग्रोथ दर्ज हो रही है।
रूस से गहरी दोस्ती
ट्रंप ने सबसे हैरतअंगेज बयान रूस के लिए दिया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका और रूस के बीच प्रतिद्वंद्विता और आपसी अविश्वास से दुनिया वाकिफ है। इसके उलट ट्रंप ने व्लादिमीर पुतिन को एक ताकतवर ग्लोबल नेता घोषित करते हुए कहा है कि राष्ट्रपति बनने के बाद वह पुतिन के साथ गहरी दोस्ती गांठने का काम करेंगे। अब देखना होगा कि दोनों मुल्कों के बीच 70 साल पुरानी दुश्मनी और प्रतिद्वंद्विता को दोस्ती में बदलने के लिए ट्रंप क्या तैयारी करेंगे?
एच1बी वीजा पर प्रतिबंध
अमेरिका में बढ़ती बेरोजगारी के लिए डोनाल्ड ट्रंप एच1बी वीजा नीति को मानते हैं। राष्ट्रपति पद संभालने के बाद वह ट्रंप एच1बी वीजा को बंद करने का प्रस्ताव कर सकते हैं जिससे वहां काम करने के लिए आ रहे बड़ी संख्या विदेशियों को रोका जा सके। इस नीति में किसी बदलाव का सीधा असर भारत पर भी पड़ेगा क्योंकि इस वीजा का बड़ा फायदा भारत से अमेरिका जा रहे लोगों को मिलता है। इसका भी इंतजार रहेगा कि बतौर अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति वह भारत के रिश्तों को मजबूत करने के लिए क्या पहल करते हैं।
मेक्सिको बार्डर पर दीवार
ट्रंप का दावा है कि वह अमेरिका और पड़ोसी देश मेक्सिको के बीच लंबी सीमा पर बाउंड्री वाल का निर्माण कराएंगे। क्योंकि लंबे समय से अमेरिका को मेक्सिको सीमा से ड्रग्स तस्करी और गैरकानूनी इमिग्रेशन की समस्या का सामना करना पड़ रहा है।
मुस्लिमों की देश में एंट्री बंद
ट्रंप कई बार साफ कर चुके हैं कि वह कट्टरवादी इस्लाम के बड़े विरोधी हैं। राष्ट्रपति पद संभालने के बाद वह मुस्लिम देशों से अमेरिका पहुंच रहे लोगों पर लगाम लगाने के लिए कई मुस्लिम देशों के नागरिकों की अमेरिका में एंट्री पर प्रतिबंधित कर देंगे।
करोड़ों मुस्लिम एमीग्रेंट को देश निकाला
बीते कुछ दशकों से आतंकवाद का सामना कर रहे अमेरिका के लिए 9-11 का हमला टर्निंग प्वाइंट था। इस हमले के बाद अमेरिका की आंतरिक सुरक्षा मजबूत करने के लिए देश में रह रहे मुस्लिम इमीग्रेंट को स्कैनर पर रखा गया। प्रचार के दौरान ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि चुनाव जीतने के बाद वह देश में मुस्लिम इमीग्रेंट की संख्या में बड़ी कमी लाने के लिए कानून लाएंगे। इंतजार करना होगा कि वह क्या कानून बनाते हैं।
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