Indian Navy: भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ी रक्षा परियोजना को मंजूरी दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) ने भारतीय नौसेना के लिए आठ अत्याधुनिक नेक्स्ट-जेनरेशन कॉर्वेट (Next-Generation Corvettes) युद्धपोत बनाने की 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की योजना को स्वीकृति दी है। ये युद्धपोत पूरी तरह भारत में बनाए जाएंगे और इनमें 70 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री तथा उपकरण इस्तेमाल किए जाने की योजना है। लगभग 2,000 टन वजनी ये आधुनिक युद्धपोत 30 नॉट की रफ्तार से समुद्र में चल सकेंगे। इन्हें दुश्मन की पनडुब्बियों, युद्धपोतों और हवाई खतरों का मुकाबला करने के लिए तैयार किया जाएगा। परियोजना के तहत पहला युद्धपोत वर्ष 2030 तक भारतीय नौसेना को सौंपने का लक्ष्य रखा गया है।
₹40,000 करोड़ में बनेंगे 8 आधुनिक युद्धपोत, समुद्र में दुश्मन की पनडुब्बियों पर रखेंगे नजर
Indian Navy: भारतीय नौसेना की युद्धक क्षमताओं को बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने आठ नेक्स्ट-जेनरेशन कॉर्वेट युद्धपोतों के निर्माण की परियोजना को मंजूरी दी है।
28 अक्टूबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की बैठक में इस प्रस्ताव को स्वीकृति दी गई। परियोजना की अनुमानित लागत 40,000 करोड़ रुपये से अधिक है।
कॉर्वेट श्रेणी के युद्धपोत अपेक्षाकृत छोटे, तेज और कई प्रकार के समुद्री अभियानों को अंजाम देने में सक्षम होते हैं। इनका इस्तेमाल तटीय सुरक्षा से लेकर समुद्री गश्त और दुश्मन के जहाजों की निगरानी तक किया जा सकता है।
भारतीय नौसेना के लिए प्रस्तावित नए कॉर्वेट लगभग 2,000 टन वजन के होंगे और इनकी अधिकतम गति करीब 30 नॉट, यानी लगभग 55 किलोमीटर प्रति घंटा होगी।
इन युद्धपोतों की एक महत्वपूर्ण विशेषता इनका स्वदेशी स्टेल्थ डिजाइन होगा। स्टेल्थ तकनीक का उद्देश्य जहाज की रडार पर पहचान को अपेक्षाकृत मुश्किल बनाना है, हालांकि इससे कोई युद्धपोत पूरी तरह अदृश्य नहीं हो जाता।
आधुनिक सेंसर, संचार प्रणालियों और हथियारों के साथ इन जहाजों को कई प्रकार के सैन्य अभियानों के लिए तैयार किया जाएगा।
इनमें दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उनका मुकाबला करने, समुद्री युद्धपोतों के खिलाफ कार्रवाई करने तथा हवाई खतरों से सुरक्षा प्रदान करने जैसी क्षमताएं शामिल करने की योजना है।
इसके अतिरिक्त ये जहाज समुद्री गश्त, तटीय रक्षा और खोज एवं बचाव अभियानों में भी इस्तेमाल किए जा सकेंगे।
भारत की समुद्री सीमा और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा में कैसे मदद करेंगे नए कॉर्वेट?
Indian Navy: भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए हिंद महासागर क्षेत्र रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। देश की लंबी तटरेखा, प्रमुख बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापारिक मार्ग भारतीय नौसेना की जिम्मेदारियों को बढ़ाते हैं।
भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्री रास्तों से होता है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश के कुल व्यापार का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा मात्रा के आधार पर और करीब 77 प्रतिशत हिस्सा मूल्य के आधार पर समुद्री परिवहन से जुड़ा है।
ऐसी स्थिति में समुद्री व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति के लिए भी आवश्यक है।
नेक्स्ट-जेनरेशन कॉर्वेट युद्धपोत भारतीय नौसेना को समुद्र में खतरों की पहचान करने और उनके विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए अतिरिक्त विकल्प प्रदान करेंगे।
इनकी पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि पनडुब्बियां समुद्र में सैन्य जहाजों और व्यापारिक जहाजों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं।
कॉर्वेट के छोटे आकार और तेज गति के कारण इन्हें बड़े युद्धपोतों के साथ संयुक्त अभियान में तथा स्वतंत्र समुद्री गश्त के लिए तैनात किया जा सकेगा।
इन जहाजों की मदद से नौसेना तटीय इलाकों के अलावा हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी परिचालन उपस्थिति बढ़ा सकेगी।
यह परियोजना भारत की व्यापक समुद्री सुरक्षा रणनीति और क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
हालांकि, नए युद्धपोत किसी एक देश के खिलाफ विशेष रूप से तैनात किए जाएंगे, ऐसी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। उनका उद्देश्य भारतीय नौसेना की समग्र रक्षा और परिचालन क्षमता को मजबूत करना है।
कोलकाता और गोवा में होगा निर्माण, 2035 तक 200 से ज्यादा जहाजों वाली नौसेना बनाने का लक्ष्य
भारतीय नौसेना के लिए स्वीकृत आठों कॉर्वेट युद्धपोतों का निर्माण देश के दो प्रमुख सरकारी शिपयार्ड में किया जाएगा।
इनमें कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) और गोवा स्थित गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) शामिल हैं।
दोनों कंपनियों के बीच निर्माण कार्य बांटे जाने की योजना है। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, परियोजना से जुड़े अनुबंध जल्द किए जाने की उम्मीद है।
इस योजना में 70 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री और तकनीक के इस्तेमाल का लक्ष्य रखा गया है। इससे रक्षा उपकरणों के आयात पर निर्भरता कम करने और भारतीय जहाज निर्माण उद्योग को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
परियोजना से छोटे और मध्यम उद्योगों को भी कारोबार के अवसर मिल सकते हैं। जहाज निर्माण, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरणों और संबंधित सेवाओं से जुड़े क्षेत्रों में प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने की संभावना है।
निर्माण कार्य लगभग एक वर्ष के भीतर शुरू होने की उम्मीद है, जबकि पहले युद्धपोत की आपूर्ति वर्ष 2030 तक करने का लक्ष्य रखा गया है।
इस परियोजना के साथ भारतीय नौसेना अपने बेड़े के व्यापक आधुनिकीकरण पर भी काम कर रही है।
नौसेना के उप प्रमुख वाइस एडमिरल अजय कोचर ने 19 अक्टूबर को बताया था कि वर्तमान में 42 नौसैनिक प्लेटफॉर्म के ऑर्डर दिए जा चुके हैं।
इसके अतिरिक्त 78 जहाजों और पनडुब्बियों तथा 120 तेज इंटरसेप्टर नौकाओं की खरीद के लिए प्रारंभिक मंजूरी मिल चुकी है। इन प्रस्तावित खरीद परियोजनाओं की अनुमानित कुल लागत लगभग 2.41 लाख करोड़ रुपये बताई गई है।
प्रारंभिक मंजूरी का अर्थ है कि सैन्य आवश्यकता स्वीकार कर ली गई है। इसका यह मतलब नहीं कि सभी प्लेटफॉर्म के अंतिम खरीद अनुबंध हो चुके हैं।
भारतीय नौसेना का दीर्घकालिक उद्देश्य वर्ष 2035 तक 200 से अधिक जहाजों वाला बेड़ा तैयार करना है। इसके साथ ही 2047 तक रक्षा निर्माण और तकनीकी क्षमताओं में अधिकतम आत्मनिर्भरता हासिल करने का लक्ष्य भी रखा गया है।
आठ नए कॉर्वेट युद्धपोतों की परियोजना इसी व्यापक आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा है। इनके नौसेना में शामिल होने के बाद भारत की समुद्री निगरानी, रक्षा तैयारियों और हिंद महासागर क्षेत्र में परिचालन क्षमता को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।
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