वैसे खबरिया चैनल ‘एनडीटीवी’ पर एक दिन के प्रतिबंध के सरकारी आदेश को फिलहाल स्थगित रख दिया गया है, मीडिया अर्थात प्रेस और अभिव्यक्ति की आजादी पर उठने वाले सवाल और खतरों पर बहसें जारी हैं। ‘एनडीटीवी’ के मामले में अहम सवाल यह है कि जिन आरोपों के आधार पर सरकार ने प्रतिबंध का फैसला लिया, वे कहां तक उचित है? दूसरा कि क्या ‘एनडीटीवी’ पर प्रतिबंध का आदेश जारी कर सत्ता यह परखना चाहती है कि असहमति के स्वर को दबाने के बाद ‘मीडिया-संसार’ की प्रतिक्रिया क्या होती है? अब यह साफ हो चुका है कि जिन कारणों को आधार बना ‘एनडीटीवी’ पर प्रतिबंध के आदेश जारी किए गए हैं, उन कारणों के दोषी कुछ अन्य चैनल व समाचार पत्र भी हंै। फिर ‘एनडीटीवी’ को अकेले निशाने पर क्यों लिया गया? जिन कथित रूप से गुप्त व संवेदनशील सूचनाओं को प्रसारित करने का आरोप ‘एनडीटीवी’ पर लगाए गए, उससे, अगर अधिक नहीं तो कम भी नहीं, अन्य न्यूज चैनल यथा ‘आज तक’ ‘न्यूज 24’ और ‘एबीपी न्यूज’ चैनल ने पठानकोट हमले से संबंधित खबरें चलाई थीं। दूसरे दिन अनेक समाचार पत्रों ने भी ऐसी सूचनाएं सार्वजनिक की थीं। स्वाभाविक सवाल है कि ‘एनडीटीवी’ के साथ-साथ अन्य खबरिया चैनलों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? ऐसे में सरकार पर यह आरोप स्वाभाविक है कि वह ‘असहज एनडीटीवी’ को सबक सिखाना चाहती थी। निष्पक्ष दर्शक व विश्लेषक एकमत होंगे कि कमोबेश ‘एनडीटीवी’ चैनल तथ्य परख खबरों का प्रसारण और बहसें आयोजित करता रहा है। अपनी विश्वसनीयता के प्रति सतर्क ‘एनडीटीवी’ ने तुलनात्मक रूप से पत्रकारीय मूल्य व सिद्धांत को अपना रखा है। इस प्रक्रिया में स्वाभाविक है कि कतिपय सरकारी नीतियों, निर्णयों और योजनाओं की आलोचना भी चैनल पर होती रही है। अनेक बार इन्हें लेकर असहमति के स्वर भी चैनल पर उठाए गए हैं, जबकि उन्हीं मुद्दों पर अधिकांश चैनलों ने सरकार का साथ दिया। गलत और सही का फैसला तो बाद में होगा, फिलहाल यह संदेश गया कि सत्तापक्ष ने साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाते हुए चैनल पर दबाव बनाना शुरू कर दिया था। इस घटना के पूर्व ‘एनडीटीवी’ चैनल के अंदर कुछ असहज स्थितियां पैदा की गईं जिसके कारण संस्थान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सहित अनेक वरिष्ठ संपादकीय सहयोगियों ने इस्तीफा दे दिया। दबाव ऐसे बने कि पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम के एक घोषित साक्षात्कार का प्रसारण अंतिम क्षणों में रद्द कर दिया गया। भोपाल में जेल से भागे आठ आतंकियों को कथित मुठभेड़ में मार डाले जाने संबंधी घटना पर ‘एनडीटीवी’ ने अनेक सवाल उठाये थे। सरकार की ओर से दी गई सफाई को एक तरह से चैनल ने अविश्वसनीय प्रमाणित कर डाला था। लोगों के बीच चर्चा रही कि संभवत: भोपाल की ‘कवरेज’ के कारण ही सरकार ने चैनल के खिलाफ दंडात्मक कदम उठाए।
सवाल वही कि क्या लोकतांत्रिक भारत की लोकतांत्रिक सरकार को असहमति के स्वर के परहेज है? अगर है तो हमें यह कहने में तनिक भी हिचक नहीं कि ऐसी सोच स्वयं लोकतंत्र विरोधी है, अधिनायकवादी प्रवृति की पोषक है। अहसमति और संशय तो पत्रकारिता की बुनियादी जरूरत है। किसी घटना पर या किसी बयान पर या फिर किसी नीति-योजना पर किंतु, परंतु व संशय व्यक्त करने का अधिकार पत्रकारिता को प्राप्त है। ये वो मानक हैं जिसकी कसौटी पार कर ही सच्चाई उभरकर सामने आती है। हां, अगर किसी खबरिया चैनल अथवा समाचार पत्र-पत्रिका देश के स्थापित कानून का उल्लंघन करती हैं तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई अवश्य हो। कानून मौजूद हैं जिनके अंतर्गत उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है। इस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी। ध्यान रहे 2007 में ‘जनमत’ चैनल ने एक फर्जी स्टिंग चलाकर कालेज की एक प्राचार्य के चरित्र हनन करने की कोशिश की थी, तब सरकार ने 30 दिनों के लिए चैनल का लाइसेंस स्थगित कर दिया था। तब न केवल मीडिया बल्कि समाज के किसी भी कोने से सरकारी कदम का विरोध नहीं हुआ था। सभी ने एक स्वर से सरकार के कदम का समर्थन किया था। आज ‘एनडीटीवी’ पर एक दिन के लिए प्रतिबंध के आदेश को अगर चुनौती मिल रही है तो इसलिए कि आदेश में पक्षपात और बदले की भावना की बू आ रही है। यह भी दोहराना होगा कि पूरे विश्व में जब-जब मीडिया को निशाने पर लिया गया है, तब-तब मीडिया के खिलाफ जनभावना भडक़ाने के लिए ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का दांव सरकारों ने खेला है। लेकिन सजग-सतर्क जनता सब कुछ समझती है, सब कुछ परखती है। जनता की समझ को कमतर कर आंकने वाली सरकारें हमेशा मुंह की खाती रही है। जहां तक भारत का सवाल है, जब इंदिरा गांधी जैसी शक्तिशाली प्रधानमंत्री ‘प्रेस सेंसरशिप’ और आपातकाल भी लागू कर अभिव्यक्ति अथवा असमति के स्वर को दबाने में सफल नहीं हो पाईं, तो अन्य किसी की क्या औकात!
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