Russia Kilo Submarine – हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में चीन की बढ़ती नौसैनिक आक्रामकता और पाकिस्तानी नौसेना के आधुनिक होते पनडुब्बी बेड़े के बीच रूस ने भारत के सामने एक बड़ा रक्षा प्रस्ताव रखा है। मॉस्को ने भारतीय नौसेना को अपनी अत्याधुनिक लंबी दूरी की सबमरीन-लॉन्च्ड ‘कैलिबर’ (Kalibr-PL) क्रूज मिसाइलें देने की पेशकश की है, लेकिन इसके साथ एक अहम शर्त भी जोड़ दी है। रूस इस उन्नत स्ट्राइक सिस्टम को अपनी नौसेना से रिफर्बिश्ड (आधुनिक रूप से रिनोवेट की गई) अतिरिक्त किलो-क्लास (सिंधुघोष श्रेणी) पनडुब्बियों की खरीद के साथ पैकेज डील के रूप में दे रहा है। 1,500 किलोमीटर से अधिक की सटीक मारक क्षमता वाली यह मिसाइल प्रणाली भारतीय नौसेना को समुद्र के भीतर से दुश्मन के जमीनी व समुद्री ठिकानों पर अचूक प्रहार करने की अभूतपूर्व रणनीतिक बढ़त दिला सकती है।
Russia Kilo Submarine – 1,500 किमी से अधिक रेंज वाली कैलिबर मिसाइल; पानी के भीतर से गहरे ठिकानों पर प्रहार की ताकत
वर्तमान में भारतीय नौसेना की किलो-क्लास पनडुब्बियां रूसी ‘क्लब-एस’ (Klub-S) मिसाइल प्रणाली का संचालन करती हैं, जिनकी रेंज अपेक्षाकृत सीमित है। यदि भारत रूस की इस पेशकश को स्वीकार करता है, तो नौसेना को 1,500 किलोमीटर से अधिक दूरी तक मार करने वाली 3M14/3M54 कैलिबर मिसाइलें मिल सकेंगी। इतनी लंबी स्टैंड-ऑफ रेंज मिलने के बाद भारतीय डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां दुश्मन के पनडुब्बी रोधी (ASW) सुरक्षा घेरे में आए बिना सुरक्षित दूरी से समुद्र या जमीन पर मौजूद रणनीतिक सैन्य अड्डों को तबाह कर सकेंगी। रूस ने इस प्रस्ताव में यह भी तकनीकी अपग्रेड शामिल किया है कि इन उन्नत पनडुब्बियों के सभी छह टॉरपीडो ट्यूबों से कैलिबर मिसाइलें दागी जा सकेंगी, जिससे नौसेना की मिसाइल फायरपावर कई गुना बढ़ जाएगी।
Russia Kilo Submarine – घटते अंडरवाटर बेड़े को तुरंत मजबूती देने का तर्क; मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर से आसान होगा संचालन
भारतीय नौसेना इस समय अपनी पारंपरिक पनडुब्बियों के रिटायरमेंट और धीमी रिप्लेसमेंट गति के चलते पानी के भीतर घटती संख्यात्मक ताकत की गंभीर चुनौती से जूझ रही है। सिंधुघोष श्रेणी की कई नावें अपने परिचालन जीवन के अंतिम चरण में हैं। ऐसे में मॉस्को ने तर्क दिया है कि रूस से मिलने वाली रिफर्बिश्ड और लाइफ-एक्सटेंडेड किलो-क्लास पनडुब्बियां नौसेना के बेड़े के अंतर (Submarine Gap) को तुरंत भर सकती हैं। चूंकि भारतीय नौसेना दशकों से किलो-क्लास पनडुब्बियों का संचालन कर रही है, इसलिए इसके लिए देश में मेंटेनेंस डॉक्स, क्रू ट्रेनिंग और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क पहले से पूरी तरह तैयार है, जिससे किसी नए विदेशी प्लेटफॉर्म की तुलना में इन्हें बेड़े में शामिल करना बेहद आसान और कम जोखिम भरा होगा।
Russia Kilo Submarine – पश्चिमी प्रतिबंधों और स्वदेशी विकल्पों के बीच भारत का मंथन; फ्रांस का स्कॉर्पीन विकल्प भी सामने
हालांकि, भारतीय रक्षा योजनाकार इस रूसी प्रस्ताव का मूल्यांकन केवल मिसाइल क्षमता के आधार पर नहीं कर रहे हैं, बल्कि इसमें शामिल भू-राजनीतिक जोखिमों को भी तौला जा रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते पश्चिमी प्रतिबंधों का खतरा, कलपुर्जों की दीर्घकालिक आपूर्ति और रूस पर रणनीतिक निर्भरता बड़ी चिंताएं हैं। दूसरी ओर, भारत फ्रांस के सहयोग से अतिरिक्त कलवरी श्रेणी (स्कॉर्पीन) पनडुब्बियों और प्रोजेक्ट-75आई (P-75I) पर भी आगे बढ़ रहा है, जहां फ्रांसीसी नौसेना भी अपनी लंबी दूरी की मिसाइलों का विकल्प पेश कर रही है। इसके अलावा भारत अपनी स्वदेशी सबमरीन-लॉन्च्ड क्रूज मिसाइलों के विकास पर भी काम कर रहा है। ऐसे में नई दिल्ली को यह तय करना होगा कि क्या कैलिबर मिसाइल का रणनीतिक आकर्षण पुरानी किलो-क्लास पनडुब्बियों के सौदे को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त है या नहीं।
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