एक हैं नीतेश राणे! कभी शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे के विश्वस्त महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे के विधायक पुत्र हैं नीतेश। पिता की तरह तेज-तर्रार नीतेश कभी-कभी बहक जाते हैं। कुछ ऐसा कि लोगों की भौंहें टेढ़ी हो जाए। हालांकि, बहकने की कड़ी में कुछ कड़वे सच भी उगल देते हैं। पिछले दिनों ऐसा ही कुछ हुआ।
नीतेश ने अपने खिलाफ छपी एक खबर पर आक्रोश प्रकट करते हुए कह डाला कि पत्रकार तो पॉकेटमार होते हैं। मीडिया में कुछ गुस्सा तो उभरा, लेकिन उबाल नहीं। क्या कारण बताने की जरूरत है? जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अवसर पर मीडिया को ‘बाजारू’ और उनके एक मंत्री वी.के. सिंह ने ‘वेश्या’ निरूपित कर डाला था, तब भी मीडिया मौन रह गया था। अब कोई यह न कहलवाए कि मौन का अर्थ स्वीकृति होता है! नीतेश ने तो सिर्फ पॉकेटमार ही निरूपित किया। आरंभ में कुछ पत्रकारों ने उनकी खबरों के बहिष्कार की बात कही, उनके विरोध की भी बातें कही गई। किंतु, सब टांय-टांय फिस्स!
तो क्या यह मान लिया जाए कि नीतेश राणे द्वारा निरूपित पॉकेटमार अलंकरण को पत्रकारों ने स्वीकार कर लिया। बात जब उठी हैं, तब और कुछ नहीं, फुसफुसाहट तो होगी ही। सो, फुसफुसाहट शुरू है। महाराष्ट्र के कुछ पत्रकार तो फुसफुसाहट में कहने लगे हैं कि डकैतों, ब्लैकमेलरों को सिर्फ पॉकेटमार निरूपित कर वस्तुत: नीतेश राणे ने पत्रकारों पर अहसान ही किया है। कई उद्धरण पेश कर रहे हैं ये पत्रकार। बिलकुल माफिया की तरह गैंग बनाकर कुछ पत्रकार ब्लैकमेलिंग का ऐसा धंधा चला रहे हैं जिससे पूरी की पूरी पत्रकार बिरादरी माफिया गैंग सरीखी दिखने लगी है। चर्चा है कि विभिन्न अखबारों व चैनलों से जुड़े कुछ तथाकथित पत्रकार राजनेताओं के साथ-साथ अधिकारियों और ठेकेदारों को निशाने पर लेते हैं। उनके खिलाफ कथित भ्रष्टाचार के कुछ सबूत एकत्रित कर यह माफिया भयादोहन के रूप में बड़ी राशि की मांग करते हैं। ऐसे ही एक मामले में पिछले दिनों महाराष्ट्र सरकार से जुड़े एक इंजीनियर को कुछ माफिया पत्रकारों ने लक्ष्य बनाया। इस खबरची के पास अपना दर्द बयान करते हुए उक्त इंजीनियर ने नागपुर के कुछ पत्रकारों के नाम बताए। उन्होंने इन पत्रकारों पर आरोप लगाया कि उनके द्वारा कुछ खरीद-फरोख्त की प्रक्रिया में कथित रूप से गड़बड़ी के सबूत के आधार पर ब्लैकमेलिंग की कोशिश की गई। कुछ पत्रकार उनके पास पहुंचे और कथित गड़बड़ी पर परदा डाले रखने की बात कर एक बड़ी राशि की मांग की। राशि इतनी बड़ी थी कि इंजीनियर महोदय ने भुगतान करने में स्वयं को असमर्थ बताया। भुगतान नहीं किया। उन्हें जब पत्रकारों से धमकी मिली तब उन्होंने अपने एक परिचित पत्रकार को पूरी बातें बताई। उस पत्रकार ने अपने स्तर पर सहायता की। जिस कारण रिश्वत मांगने वाले पत्रकार अपने अखबारों में इंजीनियर के खिलाफ खबर नहीं छाप पाए। लेकिन, शातिर पत्रकारों ने अपने एक सहयोगी दूसरे अखबार के पत्रकार से संपर्क साधा और इंजीनियर के खिलाफ दूसरे अखबार में खबर छपवा दी गई। बिचारे इंजीनियर परेशान! उन्हें ब्लैकमेलिंग की कोशिश की गई- अब मांगी गई रिश्वत की राशि और भी बढ़ा दी गई थी। इंजीनियर ने भुगतान में असमर्थता प्रकट करते हुए पूरे मामले की जानकारी अपने वरिष्ठों को दे दी। बताया जाता है कि अब उच्च स्तर पर मामले की छानबीन की जा रही हैं। परिणाम तो बाद में आएंगे, लेकिन इस एक घटना से यह तो साबित हो गया कि पत्रकार बिरादरी में ऐसे तत्व मौजूद हैं, कि जो पॉकेटमारी से आग बढ़ डकैती को तत्पर हैं। सचमुच पत्रकार बिरादरी को नीतेश राणे का अहसान मानना चाहिए कि उन्होंने सिर्फपॉकेटमार ही निरूपित किया। अगर ऐसी घटनाओं का संकलन किया जाए तो पूरा का पूरा एक ग्रंथ तैयार हो जाए। क्या पवित्र पत्रकारिता को ऐसे दागदार, ब्लैकमेलर पत्रकारों से कभी मुक्ति मिल पाएगी?
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