
घोर घमंडी, तानाशाही प्रवृत्ति की पोषक, अपनी मनमानी के लिए कुख्यात पुड़ुचेरी की उपराज्यपाल किरण बेदी, पुलिस अधिकारी से राजनेता बनीं वही किरण बेदी हैं, जिन्हें पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव में मतदाता ने दुत्कार कर बाहर कर दिया था। दिल्ली में बतौर एक पुलिस अधिकारी अदालत परिसर में पुलिस को घुसाकर वकीलों पर लाठियां बरसवाने वाली किरण बेदी आरंभ से ही अलोकतांत्रिक प्रवृत्ति की धारक रही हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि, दिल्ली में भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री के रूप में पेश बेदी को तब जनता ने नकार दिया था। इसके बावजूद सत्ता से निकटता के कारण पिछले दरवाजे से पुडुचेरी की उपराज्यपाल बनीं किरण बेदी भला अपनी आदतें सुधारतीं तो क्यों? पुडुचेरी में कांग्रेस सरकार को चुनौती देते हुए उन्होंने बयान दे डाला कि आवश्यकता पडऩे पर मंत्रिमंडल की अनदेखी कर वे राज्य सरकार के बजट में हस्तक्षेप कर सकती हैं। लगता है, दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग के इस्तीफे के बाद शांत ‘जंग’ को किरण बेदी उड़ाकर पुडुचेरी ले गई हैं।
यहां हम संवैधानिक प्रावधान, परंपरा या व्यवस्था की चर्चा न करते हुए लोकतांत्रिक भावना की चर्चा करना चाहेंगे- बिल्कुल लोकतंत्र के पक्ष में। पुन: सवाल खड़ा हुआ है कि एक निर्वाचित सरकार को पंगु कैसे बनाया जा सकता है? जब दिल्ली में उपराज्यपाल जंग वहां की ‘आप’ सरकार के प्राय: हर फैसले को उलट देते थे, हर अनुशंसाओं के विपरीत आदेश जारी किया करते थे, सरकार की नियुक्तियों को खारिज कर दिया करते थे, तब कहा जाता था कि उपराज्यपाल केंद्र सरकार के इशारे पर राज्य सरकार को और अस्थिर कर रहे थे। चूंकि, दिल्ली में गृह जैसा महत्वपूर्ण विभाग भी केंद्र सरकार के अधीन है, कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी भी केंद्र की है। अन्य महत्वपूर्ण विभाग भी केंद्र सरकार के अधीन हैं। इसके विपरीत पुडुचेरी में कानून-व्यवस्था से लेकर सभी अधिकार राज्य सरकार को प्राप्त हैं। समानता है तो सिर्फ यह कि, दोनों प्रदेशों में उपराज्यपाल के पद हैं। किरण बेदी को चाहिए कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निर्वाचित सरकार के कामकाज में कोई व्यवधान पैदा न कर सहयोगी रुख अपनाएं। लोकतंत्र में चूंकि ‘लोक’ को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, उसकी इच्छा के विपरीत कोई भी कदम अंतत: असंवैधानिक ही माना जाएगा। किरण बेदी अहं का त्याग कर इस सचाई को अंगीकार कर लें, अन्यथा जनता किसी को छोड़ती नहीं!
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