
बड़ी नोट बंद होने से क्या देश के ऊपर आर्थिक मंदी का संकट गहरा सकता है। असर की शुरुआत अभी से दिखने लगी है और चुनावी मैदान में साफ़ दिखेगी। मुंबई मनपा ,उत्तर प्रदेश और पंजाब चुनाव के लिए कई करोड़ रूपये हर पार्टी के नेताओ ने इकठ्ठा किये थे। अब वो रद्दी बन चुके है। वोट खरीदना या बेचना हालांकि ये दोनों गैरकानूनी है लेकिन ये वो पैसा था जो वोटरों तक जाता , वोटर उस पेसो का इस्तेमाल घर के राशन से लेकर दवा इलाज और अपनी जरुरत की हर चीज़ों के लिए करते। चीज़े बनती तो बिकती भी और चुनाव में कई रोज़गार खुलते। (बैनर , पोस्टर , लाउडस्पीकर,बांस ,बल्ली इत्यादि ) खपत बढ़ती तो उत्पादन में इज़ाफ़ा होता और रोज़गार बरकरार रहता। यानी वो पैसा पैसा मार्केट में घूमता रहता।नेताओ का ये पैसा देश के बेहद गरीब लोगो और मिडिल क्लास से होता हुआ बड़े नेताओ मंत्रियों , योगगुरु और अंबानी जैसे लोगो तक पहुँचता। लेकिन अब ये पैसा रद्दी हो चुका है, जो देश के मार्किट में आर्थिक हालात पैदा कर सकती है। क्योंकि आम जनता से लूटा गया ये पैसा इस बार नेता आम जन तक पहुचा नहीं सकता। और जब ये पैसा आम जन तक नही पहुचेगा तो साफ़ है की खरीददारी कम होगी, बाज़ार ख़त्म होगा।
इसका असर भवन निर्माण पर पडेगा। बिल्डर सर पकड़कर बैठ जायेंगे सीमेंट ,सरिया ,ईट रेती की डिमांड कम होगी और मजदूरों को घर बैठना पड़ेगा तो दुकानदारो को ताला लगाना होगा। नेताओ के ये पैसा हॉस्पिटल , ट्रस्ट और कई तरह की दिखलावे की सामाजिक कामो में व्हाइट मनी के रूप में लगता है, जोकि अब नहीं लगेगा। नए अस्पताल नहीं बनेंगे ,नई मेडिकल शॉप्स नहीं खुलेंगी,इंस्टूमेंट नहीं ख़रीदे जायेंगे और कंपनिया क्या करेंगी जब उनके उत्पाद बिकेंगे नहीं। एम्बुलेंस नही ली जाएँगी और नए एम्पलॉयमेंट पर कंपनियों को रोक लगानी होगी। जो है भी उन स्टाफ को कम किया जाएगा। कुछ रसूखदार नेताओ के स्कूल और विश्वविद्यालय में पैसा लगता है चुनाव बाद वो ब्लेक मनी को व्हाइट करने का इरादा लिए बैठे थे, लेकिन अब वो नहीं होगा ,उस विश्वविद्यालय स्कूल कॉलेज या अस्पताल के लिए एम्प्लायमेंट जो होना था बेरोजगारों को नौकरी मिलनी थी, अब नहीं मिलेगी क्योंकि ,पैसा कागज़ बन चूका है। आज जो बाजार चल रहा है वो नेताओ और बड़े बिजनेसमैन के ही उसी काले पैसो से देश की इकॉनामी से जुड़ा हुआ है।
मर तो आज भी गरीब रहा है ,गावों में बैंक नहीं ,जो है उनके पास पैसा खत्म या फिर 500 रूपये चेंज करने के लिए गावँ वालों को 100 रूपये भाड़ा खर्च करके शहर की तरफ जाना पड़ रहा है,पंहुचा भी तो पता चला की पैसा खत्म। बड़े शहरो के बैंक शटर गिराकर पैसे खत्म का रोना रो रहे है। बड़े बिजनेसमैन के पैसे तो स्विस बैंक और दुनिया भर के बैंको में सजे रखे हुए है फर्क किसको पड़ा मोदी जी। आज 4 दिन हो रहे है लेकिन कही से कोई खबर नहीं आई कि देश का कोई नेता या बिजनेसमैन किसी बैंक में लाईन में खड़ा होकर नोट बदलवा रहा हो। ये इरादा काला धन की वापसी के लिए था या फिर आम जनता पर आर्थिक संकट थोपना था।
नई मुद्रा में अभी वक़्त है लेकिन उन काले पैसो से जिससे आम जनता को रोजगार के अवसर थे ठप्प हो गए। अब न तो कोई नया प्रोजेक्ट लगेगा न तो उत्पादन होगा और न तो रोजगार के रास्ते होंगे। जो रास्ते है भी उनपर भी मंदी का असर दिखने लगेगा।
अभी बड़ी नोटों के आने में वक़्त है और जब आयगी तो पहले बड़े लोगो में दौड़ेगी जब तक आमजन को एक रूपये के सिक्के से लेकर महज 100 की बड़ी नोट से घर चलाना होगा।बड़ी नोटों से तो अभी भी बड़े लोग खेल रहे है देश में खेले या देश के बाहर ,खेल तो रहे है। मुझे नहीं लगता कि करेंसी बंद करने से काले धन की स्टॉक में कमी आयगी। इतिहास इस बात का साक्षी रहा है मोदी जी।
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