
अबकी बार ‘हेडलाइन’ सरकार
‘मैं देश नहीं झुकने दूंगा’ और ‘अच्छे दिन’ के वायदे के साथ आई सरकार ने अपना आधे से ज्यादा समय गुजार लिया है। इसमें दो राय नहीं कि इन दिनों में प्रधानमंत्री प्राय: अखबारों के पहले पन्ने की सुर्खियों में रहे और लोगों में राजनीतिक चेतना जगाने में उनका खास योगदान है। या यह कहें कि प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द भी खबरें बनती हैं, यह अरसे बाद उन्होंने साबित किया है। छुट्टियों के दिन रविवार को भी मन की बात जैसे आयोजनों या किसी रैली के बहाने टीवी पर राजनीतिक दृष्टि के खाली दिनों में भी काफी जगह घेर ही लेते हैं। उनका चतुर और चालाक मीडिया प्रबंधन या चर्चा में रहने का हुनर काबिले तारीफ है। बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर इंदिरा जी ने राष्ट्रीय राजनीति में खुद के होने को साबित किया था और एक बड़ी छलांग लगाई थी, नोटबंदी के बहाने भी नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक विमर्श को पूरी तरह बदल दिया। हालात यह हैं कि संसद नोटबंदी के चलते नहीं चल सकती। सरकार के ढाई साल के कामकाज किनारे हैं। पूरा विपक्ष नोटबंदी पर सिमट आया है।
राष्ट्र को जानने का हक है
कांग्रेस उपाध्यक्ष राजीव गांधी नरेंद्र मोदी से नोटबंदी पर सवाल पूछ रहे हैं। देश को भी जानने का हक है कि सरकार साफ करे कि किन फायदों और नुकसान को ध्यान में रखकर नोटबंदी सरीखा निर्णय लिया गया। खबर छपी थी कि रिजर्व बैंक के बोर्ड ने नोट बंदी के फैसले पर मुहर, प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश से महज कुछ घंटों पहले ही लगाई थी। इससे गोपनीयता का तर्क अधूरा लगने लगा है, तो आम आदमी को जानने का हक है कि नोटबंदी का खयाल शुरू कहां से हुआ? फैसला लेने में कौन-कौन लोग शामिल थे? नए छापे गए नोटों में 500 के नए नोट कितने हैं? नकदी का संकट कब तक रहने वाला है? इस फैसले से देश की अर्थव्यवस्था पर कितना बोझ पड़ा? मसलन रोजगार और कारोबार पर। अगर लोगों ने अब नए नोटों की जमाखोरी शुरू कर दी है, तो इसकी वजह ये है कि सरकार पर से लोगों का भरोसा उठ गया है। आगे क्या होगा, इसे लेकर भी लोगों के मन में आशंकाएं हैं।
देश की अच्छी खासी आबादी अभी भी नोटबंदी पर मोदी सरकार के समर्थन में है, लेकिन लोगों को अभी काफी दिनों तक इसकी तकलीफ उठानी होगी। सरकार को यह भी सरकार को राष्ट्र के सामने रखना होगा कि इस फैसले से काले धन पर लगाम लगाने, आतंकवाद और नक्सलवाद पर शिकंजा कसने के अलावा नकली नोटों का धंधा रोकने में कितनी कामयाबी मिली?
पचास दिनों बाद भी क्या भरोसा
यह सही है कि नोटबंदी से पैदा हुई समस्याओं से पार पाने के लिए प्रधानमंत्री ने पचास दिन का समय मांगा था, पर इस दौरान जितने नियम बदले गए और नगदी का प्रवाह सुनिश्चित करने में जिस तरह सरकार को मुश्किलों का सामना करना पड़ा, उससे सरकार की तैयारियों पर सवाल उठे। लोगों को जरूरत भर की नगदी उपलब्ध कराने के बजाय सरकार ने कैशलेस यानी नगदी रहित लेन-देन को बढ़ावा देने का रास्ता अख्तियार किया। मोदी सरकार ने नोटबंदी की कहानी की पटकथा चतुराई से बदल दी है, जो पहले कालेधन और फर्जी करेंसी के खिलाफ एक मुहिम थी, वह अब भारतीयों के लिए कैशलेस इकॉनमी के ऐतिहासिक अवसर में तब्दील हो गई है। इस दिशा में ग्राहकों और कारोबारियों को प्रोत्साहित करने के लिए इनामी योजनाएं घोषित की गईं। जबकि हकीकत यह है कि भारत जैसे देश में, जहां ज्यादातर रोजमर्रा के काम नगदी लेन-देन के जरिए होते हैं, यह व्यवस्था न तो हर किसी के लिए उपयोगी हो सकती है और न इसकी पहुंच सब तक है। दुनिया के तमाम विकसित देशों में भी नगदी रहित लेन-देन आंशिक रूप से ही हो पाता है, पर सरकार शायद इसके व्यावहारिक पहलुओं पर विचार नहीं करना चाहती।
जहां तक काले धन की पहचान का सवाल है, पिछले कुछ दिनों में जगह-जगह आयकर विभाग के छापों में काफी रकम पकड़ी गई है। प्रधानमंत्री ने कहा भी कि छापों के जरिए काले धन का पता लगाने में उन्हें इसलिए कामयाबी मिली कि आम लोगों ने इसकी सूचनाएं सरकार को दीं। उन्हें विश्वास है कि आम लोगों का इसी तरह सहयोग मिलता रहा तो भ्रष्टाचार से लडऩा मुश्किल नहीं है। मगर अब तक पड़े छापों में कुछ छोटे अधिकारियों, कारोबारियों के अलावा कोई बड़ा आदमी पकड़ में नहीं आया, जिससे सरकार की कार्रवाई को लेकर भरोसा बने। ऐसे छापे पड़ते ही रहते हैं। विपक्ष जो आरोप लगा रहा है कि इससे बड़े उद्योग समूहों को फायदा पहुंचाया जा रहा है, उस पर भी सरकार को अपना पक्ष रखना चाहिए। बैंकों का बहुत सारा पैसा गैर-निष्पादित संपत्ति यानी एनपीए के रूप में पड़ा है, जो बड़े उद्योगपतियों और रसूखदार लोगों के नाम है। उसे वापस लाना एक बड़ी चुनौती है। मगर सरकार उस पर कोई कड़ा रुख नहीं अपना रही। इसलिए प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचार से लडऩे के हौसले पर बहुत सारे लोगों को भरोसा नहीं बन पा रहा। अभी तक आम लोग इसलिए नोटबंदी का समर्थन करते आ रहे हैं कि उन्हें उम्मीद है कि बड़े भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसेगी। अगर ऐसा नहीं हो पाया तो उनका भरोसा देर तक शायद ही कायम रह पाएगा।
रातों रात डिजिटल नहीं हो सकता देश
कैश की कमी का संकट दूर करने और चीजों को सामान्य बनाने में देश को कैशलेस काफी अहम है। सरकार को चंद महीनों में पूरे देश में डिजिटल पेमेंट्स की ओर सौ फीसदी शिफ्ट की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। अनुमानों के मुताबिक, 70 फीसदी इकॉनमी अभी भी कैश पर ही चल रही है। भारत जैसे देश में एक बार में 86 फीसदी कैश को सिस्टम से बाहर कर देना और फिर नकदी की कमी झेलना ठीक वैसे ही है जैसे किसी स्वस्थ मनुष्य में ज्यादा अच्छा खून डालने के लिए उसके शरीर से खून निकाल लिया जाए और तब आपको पता चले कि नए खून का आपके पास पर्याप्त स्टॉक नहीं है।
क्या वास्तव में गोपनीयता जरूरी थी?
नोटबंदी के पहले दिन से ही इसकी तुलना अतीत के विमुद्रीकरण प्रयासों से की गई, पर यह तुलना उचित नहीं है। इससे पहले एक-दो बार हुई नोटबंदी का दायरा काफी सीमित था। इस बार आम लोगों में प्रचलित करंसी के जितने बड़े हिस्से को एक झटके में वापस लिया गया, उसके उदाहरण देश में तो क्या दुनिया में बहुत कम मिलेंगे। पहले दिन से ही कहा जा रहा है कि ऐसे किसी कदम के लिए गोपनीयता की बहुत जरूरत थी और इस कारण ही इसे बहुत गुपचुप ढंग से करना पड़ा। पर, गाहेबगाहे इस बात के प्रमाण मिलते रहे हैं कि बहुत बड़ी संख्या में लोगों को सरकार के इस फैसले की जानकारी थी। तब किसी बात की गोपनीयता? आज इंसान 21वीं सदी में है, जहां यह स्पष्ट है कि सरकारी प्रयास वही सफल होंगे, जो गोपनीयता के बजाय पारदर्शिता पर और गुपचुप तरीकों के बजाय व्यापक जन-विमर्श पर आधारित होंगे। बहुत जरूरी होने पर सरकार बेशक कुछ कदमों को कुछ समय तक गोपनीय रख सकती है, पर सामान्य समय में तो किसी भी बड़े नीतिगत फैसले के लिए व्यापक स्तर पर चर्चा जरूरी है। यदि ऐसी चर्चा होती तो स्वाभाविक रूप से यही नतीजा निकलता कि इसके लिए कई स्तरों पर प्रयास किया जाना चाहिए। एक बार इस तरह जनता के बीच विचार-विमर्श हो जाए तो फिर बेशक कोई विशेष कदम उठाने के लिए सरकार कुछ समय के लिए गोपनीयता भी अपना सकती है। यह भी जाहिर है कि केवल नोटबंदी से काला धन समाप्त नहीं होगा। इसके लिए कई अन्य प्रयास भी करने होंगे तथा विदेशों से काले धन को वापस लाने पर बहुत ज्यादा ध्यान देना होगा। इस बारे में मौजूदा सत्ताधारी दल ने चुनाव से पहले तो बहुत बड़े-बड़े वादे किए थे, पर उन्हें पूरा करने के लिए कोई असरदार कार्रवाई अभी तक नहीं हुई है। इस बारे में भी जनता से राय ली जा सकती थी। स्वतंत्र विशेषज्ञों से वार्ता करके भी कोई रास्ता निकाला जा सकता था। लेकिन, नोटबंदी को लेकर राय लेने की बात तो दूर, किसी को किसी तरह का संकेत तक नहीं दिया गया। विशेषज्ञों के बीच भी कोई बहस नहीं छेड़ी गई, जबकि इस तरह के कई मुद्दों को लेकर सरकार अलग-अलग तरीकों से संकेत देती रहती है। कई बार बयान देकर जनता का मूड भांपा जाता है। मीडिया में भी बहस चलाई जाती है। मगर नोटबंदी को लेकर ऐसा कुछ नहीं किया गया। यही वजह है कि इसकी योजना में बहुत गंभीर कमियां रह गईं। 8 नवंबर की रात से लेकर अभी तक सरकार जिस तरह से एक के बाद एक फैसले कर रही है और उन्हें बदल रही है, उससे साफ लगता है कि सरकार के स्तर पर भी इसे लेकर संवाद की कमी रही है। शायद सरकार अपने परामर्शदाताओं तक की राय ढंग से नहीं ले पाई।लोगों में यह उम्मीद है कि आज नहीं तो कल नोटबंदी के कुछ सार्थक परिणाम भी सामने आएंगे, जिनके बारे में सरकार लगातार बोल रही है। इसलिए अभी तक की तमाम गलतियों के बावजूद सरकार को काले धन की समस्या पर पूरी ईमानदारी से बहुपक्षीय कार्यवाही करने के साथ आम नागरिकों को राहत देने के लिए भी सचेत हो जाना चाहिए। केवल जुमलों से काम नहीं चलेगा, वास्तविक कार्य चाहिए। इसमें सफलता तभी मिलेगी जब जी-हुजूरी, चमत्कारी दावों और भाषणबाजी से बाहर निकलकर सरकार सही अर्थों में लोकतांत्रिक विमर्श करे तथा ‘हां जी, जी हां’, करने वाले सलाहकारों के स्थान पर स्वतंत्र व निष्पक्ष विशेषज्ञों की सलाह पर समुचित ध्यान दे।
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