
सत्ता हो, व्यवसाय अथवा अन्य क्षेत्र, बात यदि वर्चस्व स्थापित करने की आए तो ‘जंग में सब कुछ जायज’ के फार्मूले पर ही अंतत: अमल किया जाना आम रहा है। चूंकि, अब देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव सिर पर आन खड़े हुए हैं और जब ऐन वक्त पर समाजवादी परिवार में शुरू हुआ झगड़ा किसी भी तरह से खत्म होने का नाम नहीं ले रहा हो, तब ऐसे में आरोप लगने स्वाभाविक हैं कि उत्तर प्रदेश को येन-केन प्रकारेण जीतने के क्रम में केंद्रीय सत्ता को चुनौती देने वाले यदुवंश को ही खत्म कर देने और अखिलेश के राजनीतिक करियर को बर्बाद करने के लिए सबसे अचूक हथियार ‘अमर सिंह’ चला गया है, जो महाभारत के शकुनि का रूप धर प्रदेश में एक बार फिर से परचम लहराने को तैयार समाजवादी पार्टी में खून के रिश्तेदारों को ही आपस में लड़ाने की कूटनीति में अभी तो कामयाब ही होता दिख रहा है। वैसे भी अमर सिंह का एक अतीत ये भी है कि वे जिनके साथ रहे, उनका घर टूटा है। बच्चन भाइयों के अलावा अंबानी भाइयों में भी बंटवारा हो गया। सहारा का तो सहारा ही छिन गया। अब देखना यह है कि इस ‘शकुनि’ पहलू से ‘समाजवादी परिवार’ बचकर निकलता है, या ‘जंग में सब कुछ जायज’ फार्मूले की भेंट चढ़ केंद्रीय सत्ता को उत्तर प्रदेश की सत्ता थाली में सजाकर पेश करता है।
‘विदुर’ नीति चल रहे आजम
खैर, समाजवादी पार्टी में चल रहे पूरे घमासान में अहम बात यह है कि महाभारत के विदुर की तरह आजम खान भी चाल चल रहे हैं। विदुर नीति दुनिया की सबसे घातक नीति इसीलिए कही जाती है कि इस नीति पर चलने वाला शख्स दिखाई नहीं देता और बड़े दुश्मन को धराशायी करने के लिए छोटे दुश्मन को कुछ देर के लिए भूल जाता है। आजम खान भी अखिलेश को कमजोर करने के लिए हाल-फिलहाल अमर सिंह को भूल गए हैं और सपा सुप्रीमो को शिवपाल के पक्ष में ही बने रहने में अपना योगदान करते नजर आ रहे हैं।
समाजवादी पार्टी के अंदर चल रहे घमासान के पीछे सिर्फ और सिर्फ अमर सिंह के शातिर दिमाग की करामात मानना आम है। मात खाये अमर सिंह घात लगाये बैठे थे और अनुकूल समय आते ही ऐसी चाल चली कि देश का सबसे मजबूत समझा जाने वाले राजनैतिक परिवार का भवन भरभरा के गिर गया। हालात अब इतने भयावह हो चले हैं कि हर ईंट यह समझ रही है कि भवन का आधार वही है। महाभारत जैसी ही स्थिति में ‘शकुनि’ के रूप में अमर सिंह भले ही सबको दिखाई दे रहे हैं, लेकिन अन्य पात्र भी विपरीत विचारधारा होने के बावजूद अखिलेश के विरुद्ध एकजुट हो गए हैं। कृष्ण विहीन अखिलेश महाभारत में फंसे तो हैं, लेकिन अच्छी बात यह है कि वह अभी तक विचलित नजर नहीं आ रहे हैं, उनके अंदर साहस जागा है।
‘अमर महाभारत’ में ‘शकुनि’ की गोटी
सूत्रों की मानें तो समाजवादी पार्टी से राज्यसभा जाते ही अमर सिंह ने सरकार में दखल देने के प्रयास शुरू कर दिए, लेकिन अखिलेश ने उन्हें सरकार के आसपास भी नहीं फटकने दिया। अब अमर सिंह राज्यसभा सांसद के रूप में वेतन लेने तो आए नहीं थे। पारिवारिक स्थितियां उन्हें पता ही थीं। अखिलेश के सामने मनमानी कोई नहीं कर पा रहा था। मंत्री के रूप में शिवपाल सिंह यादव अपने विभागों तक सीमित होने के चलते आहत थे। रामगोपाल यादव पूरी गंभीरता के साथ दिल्ली अकेले संभाल रहे थे। इन सबसे अलग साधना गुप्ता वाली शाखा अस्तित्व की लड़ाई भी नहीं लड़ पा रही थी। हाथ-पैर मारने के बाद सफलता दूर नजर आई, तो प्रतीक यादव ने राजनीति से स्वयं को अलग ही कर लिया और सपा सुप्रीमो के माध्यम से दो-चार लोगों को लाभान्वित कराने तक सिमट गए। उनकी पत्नी अपर्णा के पिता पत्रकार हैं, सो वे पिता के निर्देशन में राजनीति में स्थापित होने का प्रयास करती रहीं। इतना सब लंबे समय से घट रहा था, लेकिन सपा सुप्रीमो के सम्मान और अखिलेश की सैद्धांतिक सोच के चलते कोई कुछ कह नहीं पा रहा था। शतरंज से पूरा परिवार दूर था, इस सबसे अमर सिंह भली-भांति परिचित थे ही, सो उन्होंने बड़ी ही चालाकी से एक चाल चल दी, जिसके बाद बाकी सब अपनी-अपनी चालें उनके हिसाब से चलने को मजबूर हो गए।
लखनऊ-बलिया एक्सप्रेस-वे पर मचा घमासान
सूत्रों की मानें तो घमासान के पीछे कारण तो कई हैं, लेकिन अमर सिंह ने जिस कारण से घमासान कराया, वो है लखनऊ-बलिया एक्सप्रेस-वे। लखनऊ, बाराबंकी, सुल्तानपुर, फैजाबाद, आम्बेडकरनगर, आजमगढ़, मऊ और गाजीपुर होते हुए बलिया तक जाने वाले 11 हजार करोड़ रु से भी ज्यादा के 348 किमी लंबे इस एक्सप्रेस-वे को लेकर अखिलेश यादव बेहद उत्साहित थे। आगरा एक्सप्रेस-वे के निर्माण में कोई बड़ा विवाद नहीं हुआ, आरोप नहीं लगा। भ्रष्टाचार मुक्त और गुणवत्तायुक्त कार्य होने से अखिलेश गद्गद् थे और चाहते थे कि ऐसे ही लखनऊ-बलिया एक्सप्रेस-वे का भी निर्माण हो, लेकिन वे यह भूल बैठे थे कि आगरा एक्सप्रेस-वे के समय अमर सिंह नहीं थे। अमर सिंह ने लखनऊ-बलिया एक्सप्रेस-वे बनाने का कार्य किसी और कम्पनी को दिलाने की बात परिवार के बीच आगे बढ़ाई, जिसे अखिलेश ने ठुकरा दिया और दो लोगों के बीच की जिद बड़े घमासान में तब्दील होती चली गई। अमर सिंह ने पहले हालात उत्पन्न किए और फिर आहत लोगों को एकजुट कर दिया। साधना गुप्ता की शाखा को समझाया कि आप सीधे लड़ेंगे, तो पूरा परिवार आपके विरुद्ध एकजुट हो जाएगा, इसलिए नेता जी के सहारे शिवपाल को शक्ति दो। चूंकि, नेता जी का झुकाव अब साधना की ओर है, सो वे मौन होने को मजबूर हैं। लिहाजा शिवपाल का शक्तिशाली होना स्वाभाविक ही था। शिवपाल को यह लगता रहा है कि अखिलेश उन्हें रामगोपाल यादव के कहने पर आहत करते रहे हैं, वहीं मथुरा कांड के समय दोनों में टकराव हो भी गया था। इसके अलावा अमर सिंह अपने अपमान का बदला भी चाहते थे। सो शक्तिशाली होते ही शिवपाल का पहला वार रामगोपाल यादव गुट पर ही हुआ। सीधे तौर पर अखिलेश पर वार कोई नहीं कर रहा, लेकिन उन्हें इतना कमजोर किया गया कि अखिलेश को यह अहसास हर समय रहे कि वे मुख्यमंत्री उनकी कृपा पर हैं, वे चाहेंगे, तो एक क्षण भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठ पायेंगे।
परिवार का झगड़ा सडक़ पर लाने में माहिर हैं अमर
राजनीति में कई बार जो कहा जाता है, मतलब ठीक उसका उल्टा होता है। जब मुलायम सिंह यादव सरेआम कहते हैं कि अखिलेश यादव की सरकार में जमीन कब्जा, लूट और भ्रष्टाचार का बोलबाला है, तो उनका मतलब अखिलेश सरकार की आलोचना नहीं, विपक्ष के हमले की धार को कमजोर करना होता है। अमर सिंह की इस्तीफा देने की धमकी के बाद जब आजम खान कहते हैं कि अमर सिंह जो कहते हैं, वही करते हैं तो उसका मतलब तारीफ नहीं बल्कि उन्हें जलील करते हुए यह बताना होता है कि अमर सिंह सिर्फ गीदड़ भभकी दे रहे हैं। और जब शिवपाल यादव कहते हैं कि कौन सा मंत्रालय किसे देना है, यह मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है, वो नाराज नहीं हैं, तो वह कह रहे होते हैं कि वह अखिलेश यादव से इतने नाराज हैं कि अब उनके साथ बिल्कुल काम नहीं कर सकते। लेकिन, हर सवाल के जवाब में नेता जी का नाम जप कर और बेहद नपे-तुले शब्दों में जवाब देने के बावजूद शिवपाल इस सच्चाई को छुपा नहीं पाए कि देश के सबसे ताकतवर यादव परिवार का झगड़ा अब सडक़ पर सरेआम लाया जा चुका है। और इस बार इस झगड़े की जड़ में है वह शख्स जो दोबारा समाजवादी पार्टी में जड़ें नहीं जमा पाने के कारण अब शिवपाल नाम के दरख्त पर ‘अमरबेल’ बन कर लिपट गया है। बात जब तक चाचा-भतीजे के बीच थी, तब तक रूठना, मनाना और मुलायम की डांट से सब कुछ ठीक हो जाया करता था, लेकिन यदुवंशियों को समूल नष्ट करने की कसम खाकर घर में घुसे अमर ने वो कहर ढाया है कि पार्टी मायूस और निराश है। सबकी जुबान पर एक ही सवाल है कि ‘शकुनि’ की चालों के चलते क्या मुलायम परिवार और पार्टी का भी वही होगा, जो यदुवंश का हुआ था?
साढ़े चार से अब यूपी में सिर्फ एक मुख्यमंत्री!
इस खेल में अमर सिंह जैसे मोहरों की कितनी देर तक अहमियत बनी है, यह बात जरूर देखने वाली है। हां यह तो निश्चित है कि जल्द ही सपा में उनकी अहमियत खत्म हो जाएगी, ठीक उसी प्रकार जैसे बच्चन परिवार के कुनबे में से वह बाहर हुए, अंबानी बंधुओं के दायरे से वह बाहर हुए। हां, तब तक मुलायम सिंह जरूर अखिलेश की स्वतंत्र छवि-गठन का कार्यक्रम कुशलतापूर्वक पूरा कर चुके होंगे। सोचना तो होगा ही कि साढ़े चार साल तक यूपी में साढ़े चार मुख्यमंत्री थे, किन्तु अब बचे कुछ महीनों में सिर्फ एक ‘सीएम’ है और वह है ‘अखिलेश यादव’! है ना मास्टरस्ट्रोक!!
मुलायम सिंह जिस दौर के नेता हैं उसमें सफलता के लिए युद्ध और प्रेम में सब कुछ जायज है, का सूत्र कदापि मान्य नहीं था। लेकिन, कोई मुलायम सिंह को दुनियादार कह सकता है और कोई पथभ्रष्ट, पर मुलायम ने सफलता के लिए किसी लक्ष्मण रेखा को अपनी बाधा नहीं बनने दिया और इसके बावजूद जनमानस में अस्वीकार होने की बजाय यूपी की राजनीति में शिखरपुरुष के रूप में अपने आपको स्थापित करने में कामयाबी हासिल की। अगर समाजवादी विचारधारा के अनुशीलन में मुलायम सिंह की इतनी निष्ठा होती तो उनकी पार्टी के कलेवर में अमर सिंह को आमुख बनाना संभव नहीं था। छोटे लोहिया के खिताब से विभूषित जनेश्वर मिश्र के जीवित रहते हुए ही अमर सिंह समाजवादी पार्टी के स्टेटस सिंबल के रूप में स्वीकार किए जा चुके थे। पार्टी खड़ी करने के लिए मुलायम सिंह ने सोशलिस्ट आयडोलॉग में शुमार तमाम नेताओं को अपनी टीम में जोड़ा था। यह नेता मुलायम सिंह का उनके मुंह पर प्रतिवाद करने का साहस रखते थे और उनके अपने कद और अपनी पहचान की वजह से मुलायम सिंह उनकी सुनने को अपने को मजबूर पाते थे। लेकिन, जल्द ही ऐसा दिन समाजवादी पार्टी में भी आया जिसमें मुलायम का प्रतिवाद न किया जा सके। जनेश्वर मिश्र जैसे नेता भी मार्गदर्शक की हैसियत खोकर कब मुलायम के अनुचर की भूमिका में पहुंच गए, यह अंदाजा किसी को नहीं हो सका। वह सिर्फ इसलिए कि सोशलिस्ट दर्शन के सर्वथा विलोम अमर सिंह सपा की पहचान बना दिए गए, अत: पार्टी में विद्रोह नहीं हो सका। यह दूसरी बात है कि आगे चलकर खुद अमर सिंह ने ही मुलायम सिंह से विद्रोह कर दिया था।
समाजवादी पार्टी में गैर समाजवादी तंत्र
अपराधियों की पार्टी की इमेज से उबारने की कवायद
विकसित होते लोकतंत्र में परिष्कृत राजनीतिक शैली की जरूरत होती है। इसी समझदारी के चलते अखिलेश 2012 के विधानसभा चुनाव के समय से ही समाजवादी पार्टी को अपराधियों की पार्टी की इमेज से उबारने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। उन्होंने डीपी यादव के टिकट के मसले में इसी स्टैंड के चलते मोहन सिंह जैसे समाजवादी आयडियोलॉग तक को नीचा दिखाकर परे करने में संकोच नहीं किया था, लेकिन आज समाजवादी पार्टी में जो हो रहा है उसमें इस ख्याल की कोई परवाह नहीं रह गई है जबकि मुलायम सिंह तक को यह अहसास है कि उनके बेटे ने समाजवादी पार्टी को नये जमाने की जरूरतों के मुताबिक गढऩे की जो कोशिश की है वह गलत नहीं है। लेकिन, शिवपाल ने जब इलाहाबाद के जाने-माने माफिया अतीक अहमद को कानपुर की कैंट सीट से समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार बनाने की घोषणा की तो मुलायम अपने बेटे का पक्ष लेने के लिए सामने नहीं आ सके थे।
क्या अमर सिर्फ बदनाम होने के लिए ही हैं?
कई विश्लेषक इस बात को भी उठा रहे हैं कि समाजवादी पार्टी में जो हालिया कलह दिख रही है, उसके सूत्रधार खुद नेताजी ही हैं जिसमें घूम-फिरकर घड़ी की सुई अखिलेश को ही वर्तमान समय का नायक बताने की कोशिश कर रही है तो भविष्य का तारणहार भी अखिलेश को ही बनाया जा रहा है। इसी क्रम में अमर सिंह जैसा चरित्र सपा के हाथ में है जिसे कितना भी बदनाम करें, फर्क नहीं पड़ता। हालांकि, अमर सिंह का इतिहास और छवि अपने आप में ‘ब्लैक’ है और वह दूध के धुले नहीं हैं, किंतु संदेह इस बात पर वाजिब है कि क्या वाकई समाजवादी पार्टी की इस किचकिच में अमर सिंह की भूमिका इतनी बड़ी हो गई है? शायद ही किसी को आसानी से यह बात पचे कि अखिलेश उन्हें हटाने पर तुल गए हैं तो मुलायम उन्हें किसी कीमत पर बचाने पर तुले हैं। मुलायम का सार्वजनिक मंच से यह कहना कि अगर अमर नहीं होते तो मैं जेल में होता और इसलिए वह मरते दम तक उनका साथ नहीं छोड़ेंगे, यह बताने के लिए पर्याप्त है कि सपा कुनबा अमर का किस कदर इस्तेमाल कर रहा है। आखिर, इस सियासी ड्रामे के बाद जब ‘फैमिली-मिलन समारोह’ होगा तो इस पूरी किचकिच के लिए कोई न कोई तो चाहिए, जिसे जिम्मेदार ठहराया जा सके! मतलब ‘बलि का बकरा’ बनाकर अमर सिंह को बाहर किया जाएगा और फिर सब ठीक हो जाएगा। आखिर यह बात भी कैसे पच जाए कि सपा में वापस आते ही अचानक इतने ताकतवर हो गए अमर सिंह? ध्यान से देखें तो उनकी ऐसी राजनीतिक हैसियत नहीं नजर आती है कि वह अखिलेश और मुलायम के बीच में दरार डालने का काम कर सकें! हां वह राजनीतिक और कुटनीतिक मामलों में जरूर थोड़े तीक्ष्ण माने जाते हैं, पर तेज दिमाग के और भी हजारों लोग हैं और इतनी भर योग्यता पर्याप्त नहीं है सपा जैसे पार्टी की नीतियों पर भारी पडऩे के लिए! हालांकि, अमर सिंह ने कई अवसरों पर सरकार बनाने और अन्य राजनीतिक फैसलों में उन्होंने अपनी भूमिका साबित की है, पर इस बार का हो रहा ‘सपाई ड्रामा’ उनकी पिछली छवियों के आधार पर गया प्रतीत होता है। वह गाली भी खा रहे हैं, एक तरफ मुलायम उनके लिए बाहें फैला रहे हैं, तो दूसरी तरफ अखिलेश उन्हें खुलकर ‘दलाल’ कह रहे हैं। खूब प्रचारित किया जा रहा है कि अमर सिंह घर तोडऩे में माहिर हैं, परिवार तोडऩे में माहिर हैं, पार्टियां तोडऩे में माहिर हैं, पर सच तो यही है कि ऐसे लोग इस्तेमाल भर होते हैं।
‘शकुनि’ हैं तोजुबान क्यों नहीं खुली?
अमर सिंह ने एक बार धमकी दी थी कि अगर उन्होंने मुलायम सिंह की करतूतों पर अपनी जुबान खोल दी तो गजब हो जाएगा। लेकिन, सब जानते हैं कि नेताजी के बारे में जुबान खोलना इतना आसान नहीं है। इसलिए अमर सिंह भी खूब नाराज बने रहे, लेकिन ऐसा साहस नहीं कर सके। जाहिर है कि मुलायम सिंह को अमर सिंह की गरज किसी डर की वजह से महसूस नहीं हो रही, लेकिन फिर उनमें ऐसे क्या लाल लटके हैं जो मुलायम सिंह उन पर घोर अनबन हो जाने के बावजूद लट्टू बने हैं। निश्चित रूप से यह एक पहेली है।
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