
जानकारियां, खबरें, अदालती आदेश बेचैन करने वाली हैं। संविधान, कानून वर्णित तर्कों की प्रमाणिकता से इतर न्याय की मूल अवधारणा कि न्याय ना केवल हो, बल्कि होता हुआ दिखे भी, के विपरीत कतिपय ताजा आदेश हमें बेचैन कर रहे हैं। देश के दो व्यावसायिक घरानों पर आयकर विभाग के छापों के दौरान प्राप्त बहीखातों में दर्ज कुछ बड़े राजनेताओं के नामों के आगे भुगतान की गई बड़ी राशियों की चर्चा
सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता की अपेक्षा को चुनौती देने वाली है। मामला सर्वोच्च न्यायालय में गया तो अदालत ने अपर्याप्त सबूतों एवं सुनवायी के अयोग्य मामला बताते हुए इससे संबंधित किसी भी जांच से इनकार कर दिया। कहा गया कि अगर इस तरह के कागजात मिलने के बाद कोई कार्रवाई होती है तो लोकतंत्र प्रभावित होगा।
दिल्ली में जिस सूचना आयुक्त ने सूचना के अधिकार के अंतर्गत एक आवेदन पर दिल्ली विश्वविद्यालय को आदेश दिया कि वह प्रधानमंत्री की डिग्री से संबंधित मामले में वर्ष 1978 में बी.ए. की परीक्षा में शामिल, उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण व प्राप्तांक पड़ताल के लिए आवेदनकर्ता को उपलब्ध कराए, उस आयुक्त से दो दिनों के अंदर शिक्षा से संबंधित मानव संसाधन विभाग छीन लिया गया।
जम्मू-कश्मीर में सीमा सुरक्षा बल के एक जवान ने जब कथित रूप से जब घटिया भोजन दिए जाने संबंधी एक वीडियो को सार्वजनिक किया, तब उसे ‘प्लंबर’ का काम दे दूसरे स्थान पर भेज दिया गया। उच्चाधिकारियों ने आरोप लगाया कि जवान पहले भी अनुशासनहीनता का दोषी ठहराया जा चुका है, सनकी है। जबकि, सच यह है कि स्वर्ण पदक प्राप्त उस जवान को स्वयं सीमा सुरक्षा बल चौदह बार सम्मानित कर चुका है।
तो क्या, देश में सच बोलना, विरोध जाहिर करना, असहमति प्रकट करना या फिर कथित भ्रष्टाचारों को अनावृत करना अपराध बन जाएगा? यह अकल्पनीय है। जिस लोकतंत्र की दुहाई सर्वोच्च न्यायालय ने दी है, उस लोकतंत्र का ही तकाजा है कि उच्च स्तर पर पदासीन व्यक्ति हर कोण से स्वच्छ, निर्मल, असंदिग्ध होना चाहिए। संदेह की स्थिति में निष्पक्ष जांच कर सच-झूठ को सामने लाया जाना चाहिए। कोई संदिग्ध सत्ता सिंहासन के शीर्ष पर कैसे बैठ सकता है? कानून, संविधान कुछ भी कहे, परंपरा रही है, नैतिकता का तकाजा है कि वह व्यक्ति स्वयं न्याय के सामने पेश हो अपनी निर्दोषिता साबित करे। लोकतंत्र तभी स्वच्छ रह पाएगा, मजबूत हो पाएगा, और अबाधित चल पाएगा। ये बातें इसलिए कि ‘सहारा-बिड़ला डायरियों’ के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश से देश का सामान्य जन विचलित है। लोकतंत्र, सत्ता और न्यायपालिका को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
बात जब डायरी और कथित रूप से रिश्वत के रूप में भुगतान की प्रविष्टियों की आई है तब, कुख्यात ‘हवाला कांड’ की याद बरबस आ जाती है। याद करने को विवश हूं, तब मामले में सर्वोच्च न्यायालय की एक टिप्पणी को। हवाला कांड जब सुनवायी के लिए सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा था, तब न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि, ‘‘सभी सरकारी एजेंसियों से आशा की जाती है कि वे कानून के अनुसार अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य निभाएं, वे अपना कार्य करते समय संविधान में बताई गई समानता की अवधारणा और कानून के नियमों के इस आधारभूत विचार को सदैव ध्यान में रखें कि…‘आप चाहे जितने बड़े हों, कानून आपसे बड़ा है’, तार्किक आधार पर प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर लगे आरोप की पूरी और शीघ्र जांच की जानी चाहिए। इसमें उसके ओहदे और सामाजिक स्थिति को महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। यह सरकारी एजेंसियों की गैर भेदभावपूर्ण कार्रवाई के प्रति जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक है।’’
30 जनवरी 1996 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हवाला कांड में की गई उपर्युक्त टिप्पणी निश्चय ही सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता, ईमानदारी और लोकतंत्र की जीवंतता की पक्षधर है। मैं इस बिंदु पर दुखी मन से यह टिप्पणी करने को विवश हूं कि आलोच्य मामले में विद्वान न्यायधीशों ने लगता है 1996 में की गई अपनी ही अदालत की टिप्पणी को नजरअंदाज कर दिया। न्याय का तकाजा था कि आरोपों की जांच की जाती और सबूतों के आधार पर फैसला आता-जैसा कि हवाला कांड में हुआ। हवाला कांड में अंतत: सभी आरोपी निर्दोष घोषित किए गए थे। इस मामले में जांच से इनकार कर न्यायालय ने वस्तुत: उन लोगों को संदिग्ध बने रहने दिया, जिनके नाम डायरी में मिले हैं। क्या यह अवस्था लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सबल बनाएगी?
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