
शाहिद अंसारी
मुंबई:महाराष्ट्र में हिरासत में हुई मौतों को लेकर सेंट्रल ह्युमन राइट कमीशन के ज़रिए जो मुआवज़ा अदा करने का आदेश दिया गया लेकिन हैरान कर देने वाली बात यह है कि महाराष्ट्र में पुलिस हिरासत में हुई मौत के एक मामले में पीड़ित परिवार (केस नंबर 1010/13/22/2011-PCD) को बतौर मुआवज़ा 25000 रूपए ही दिया गया है जबकि न्यायिक हिरासत में हुई मौत को लेकर मेज़ोराम सरकार ने एक पीड़ित परिवार को 3 लाख रूपए बतौर मुआवज़ा अदा किया है।
सेंट्रल ह्युमन राइट्स कमीशन की ओर से जारी नवंबर के न्युज़लेटर रिपोर्ट के अनुसार अक्तूबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा 134 मामलों में 71 मामलों के निपटारे के बाद 24 मामले ह्युमन राइट्स के अंतर्गत आए जिनमें न्यायिक और पुलिस हिरासत में हुई मौतों की संख्या 12 है जिनमें आंध्र प्रदेश,उत्तर प्रदेश,छत्तीसगढ़,मेजोराम,राजस्थान,केरला,झारखंड,महाराष्ट्र बिहार शामिल है।ताज्जुब इस बात का कि मेज़ोराम सरकार द्वारा एक हिरासत में हुई मौत के लिए 3 लाख देने का आदेश जारी किया गया जबकि महाराष्ट्र में हुई पुलिस हिरासत में एक मौत के मामले में मात्र 25000 हज़ार रूपए ही बतौर मुआवज़ा दिया गया है।
ह्युमन राइस्ट एक्टिविस्ट और वकील भावेश परमार ने कहा कि मुआवज़े में अमाउंट कितना बड़ा या छोटा यह फिक्स नहीं होता लेकिन किसी की मौत पर मात्र 25000 रूपए देना यह उस परिवार के साथ और मानव अधिकार के साथ एक घटिया मज़ाक है।इसका मतलब यह हो गया कि किसी की हिरासत में हुई मौत अब इतनी सस्सी होगई है कि मात्र 25000 रूपए देकर उसकी भरपाई की जा सकती है।
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